29 मार्च 2017

जब नाश मनुज पर छाता है...

द इंडियन एक्सप्रेस से लिए गए इस आलेख में सुशांत सिंह बता रहे हैं कि कैसे रवांडा से मिले सबक़ को याद करें तो व्हाट्सऐप पर तेज़ी से फैल रहे नफ़रत भरे संदेशों को लेकर चिंतित होना लाज़िमी है.

व्हाट्सऐप के ज़रिए हमें जो फ़र्ज़ी मैसेजेज़, ज़हर उगलते वीडियोज़ मिल रहे हैं, उन्हें अप्रासंगिक क़रार देकर सीधा ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
साल 1994, देश रवांडा. 12 हफ़्तों के दौरान यहां हुतु समुदाय के लोगों ने तुत्सी समुदाय के क़रीब आठ लाख लोगों की हत्या की थी. इसे आधुनिक युग का सबसे ख़तरनाक़ नरसंहार माना जाता है. हिंसा के इस दौर में वहां के एक प्राइवेट रेडियो-टेलिविज़न लिब्रे दस मिल कालिन्स (RTLMC) पर प्रचारित नारा था - सारे क़ब्रिस्तान अभी भरे नहीं हैं.  हालांकि इस नरसंहार की जड़ें रवांडा के औपनिवेशिक इतिहास में समाई हुई हैं, लेकिन नफ़रत की इस आग को हवा देने का काम मीडिया ने किया था, ख़ास तौर पर रेडियो ने. रवांडा के नरसंहार को भड़काने और फैलाने में मीडिया एक ताक़तवर हथियार साबित हुई.

23 साल बीत चुके हैं, और भारत अभी रवांडा बनने से कोसों दूर है, लेकिन उस दौरान मिले सबक़ आज की परिस्थिति में बहुत बड़ी अहमियत रखते हैं. आज व्हाट्सऐप या दूसरे डिजिटल मंचों के ज़रिए हमें जो फ़र्ज़ी मैसेजेज़, ज़हर उगलते वीडियोज़ और दूसरे समुदायों को केंद्रित कुतर्की उपहास मिल रहे हैं, उन्हें अप्रासंगिक क़रार देकर सीधा ख़ारिज नहीं किया जा सकता. शत्रुता फैलाने की ये सधी-अनसधी कोशिशें बदक़िस्मती से एक भयावह वक़्त का दस्तक जान पड़ती हैं. ये मैसेजेज़ संप्रदायों के बीच नफ़रत फैलाने की एक बड़ी योजना के छोटे-छोटे पुर्जे हैं.

1990 के शुरुआती दौर से ही तुत्सी विरोधी आलेख और ग्राफ़िक कार्टून्स कंगूरा नाम के एक अख़बार में छपने लगे थे. जून 1993 में, रवांडा में RTLMC का प्रसारण शुरू हुआ था. यह रेडियो स्टेशन उपद्रव फैलाने का ज़रिया था. किसी भी दूसरे रेडियो स्टेशन की तरह ही इस पर भी आम बोलचाल की भाषा इस्तेमाल होती थी, डिस्क जॉकी हुआ करते थे, पॉप म्यूज़िक भी था और फ़ोनो भी लिए जाते थे. ये रेडियो स्टेशन बेरोज़गारों, गुंडा तत्वों और मिलिटेंट गैंग्स को लुभाने के लिए ही बना ही था. ब्रिटिश पत्रकार लिंडा मेलवर्न की मानें तो, “अनपढ़ लोगों की बहुत बड़ी आबादी के बीच उस रेडियो स्टेशन को जल्द ही एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग मिल गया जिन्हें वो चैनल बेहद दिलचस्प लगा.”

RTLMC के प्रसारण से जुड़े ट्रांसक्रिप्ट्स ड्यूक यूनिवर्सिटी के इंटरनैशनल मॉनिटर इंस्टिट्यूट में उपलब्ध हैं.  नरसंहार को रंग देने के रेडियो स्टेशन के उन प्रयासों पर तब से काफ़ी अध्ययन हुए हैं. यह चैनल लोगों से “काम पर जाने” को कहता था और सबको पता था कि काम पर जाने का मतलब है हथियार उठाना और तुत्सियों की हत्या करना. लेकिन जो चीज़ इन अध्ययनों से बचकर निकल गईं वो थी इस रेडियो स्टेशन के काम करने का तरीक़ा - ये तुत्सियों को हैवान बताता था, साथ ही नफ़रत और हिंसा को बढ़ावा देता था - ऐसा कर इस रेडियो स्टेशन ने रवांडा में लोगों के बीच नरसंहार की ज़मीन तैयार की.

ये ट्रांसक्रिप्ट्स ख़ुलासा करते हैं कि RTLMC रवांडाई इतिहास को अपने हिसाब से गढ़ने की कोशिश कर रहा था और उनके रचे इतिहास में सत्य और तथ्य की कोई जगह नहीं थी. इस इतिहास पर कट्टरपंथी हुतु अतिवादियों का एकाधिकार था.  सच्चाई को ऐसी कहानियों से बदल दिया गया कि जिसके चलते इस नरसंहार को सही ठहराने का आधार मिल गया. “दासता” शब्द का इस्तेमाल इन ट्रांसक्रिप्ट्स में बार-बार देखने को मिलता है, रेडियो स्टेशन पर बुलाए गए लोग औपनिवेशिक काल का वो दौर याद करते थे जब देश भर में हुतु समुदाय को दास बनाकर रखा जाता था. ऐसी शब्दावलियों का इस्तेमाल कर रेडियो स्टेशन ने रवांडाई नरसंहार को दास विरोधी आंदोलन का जामा पहनाया. हुतु समुदाय के लोगों को लगा कि RTLMC उनके सामने सच्चे इतिहास पर से पर्दा उठाने और उन्हें उनके असली अतीत से दो-चार करवाने के लिए आया है. ये कहानी वहां राज कर चुके अंग्रेज़ों और वहां के स्थानीय लोगों द्वारा बताए गए इतिहास से बिल्कुल अलग था.

अगर तब के दौर में रेडियो इतना ताक़तवर ज़रिया था, जहां आपको बस एक ट्रांज़िस्टर और कुछ बैटरियों की ज़रूरत थी, तो आज तो हम सबके पास स्मार्टफ़ोन्स हैं, व्हाट्सऐप है. ज़हर उगलते मैसेजेज़ की भरमार RLTMC की उसी कहानी का प्रतिबिंब मालूम पड़ती है. इतिहास के एक नये संस्करण को गढ़ने की कोशिश. वक़्त देकर सलीके से बनाए गए इन उपहास उड़ाने वाले क्लिप्स, वीडियोज़ और मैसेजेज़ की शक़्ल में नफ़रत, अपशब्द और ख़ुद के ऊपर हुए ‘कथित अत्याचार’ से भरे जो क़िस्से हमें परोसे जा रहे हैं वो सियासी हरक़तों को सही ठहराने का आधार मुहैया करते हैं. ऐसी कुछ कहानियों में नेहरू का ऐड्स से मरना, 2000 रुपये के नये नोटों में सैटेलाइट ट्रैकिंग चिप का लगा होना शामिल हैं - चाहे कितने भी बड़े कुतर्क हों, लेकिन इनका काम करने का तरीक़ा ही यही है. जिसे हम कुतर्क मानते हैं वो एक बड़े वर्ग को सच पर से पर्दा उठाने जैसा लगता है. ये कुछ कुछ नाइजीरिया के उस ईमेल घोटाले जैसा है जिसके तहत आपको जानबूझकर करोड़ो रुपये का झांसा देने वाले ईमेल भेजे जाते हैं, और इन झांसों में फंसने का सारा दारोमदार ख़ुद आप पर होता है. जब कोई फ़र्ज़ी व्हाट्सऐप मैसेज ख़बरिया चैनलों की सुर्ख़ियां बनता है तो इससे साफ़ होता है कि हममें से कई इन झांसों में फंसे हैं और हमें इन पर यक़ीन करने से पहले सत्य और तथ्य की पड़ताल करनी चाहिए.  

टेक्नोलॉजी आदर्श और सिद्धांतों पर नहीं चलती. ये इन मूल्यों को लेकर निरपेक्ष होती है. यानी इसका ऐक्सेस किसे मिलेगा - नफ़रत फैलाने वाले को या प्यार फैलाने वाले को - ये तय नहीं किया जा सकता. और यही चीज़ जो व्हाट्सऐप को लोकप्रिय बनाती है, इसे रेडियो, ट्विटर या फ़ेसबुक से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक़ भी बनाती है. यहां आप ख़ुद ही शिकार बनते हैं. इस मंच ने नफ़रत फैलाने वाले मैसेजेज़ को आगे बढ़ाना बेहद आसान बना दिया है, लोग आसानी से डियो या वीडियो मैसेज रिकार्ड कर एक चुनिंदा ग्रुप को भेज सकते हैं. एक बटन दबाते ही जुनून और जोश से भरे ये भड़कीले और तथ्यहीन मैसेजेज़ चुनिंदा और कुछ हद तक मिलती-जुलती सोच वाले लोगों तक पहुंच जाते हैं और उन लोगों के ज़रिए ये पलक झपकते ही वायरल हो जाते हैं.

पिछले कुछ सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जिनमें व्हाट्सऐप पर फ़र्ज़ी वीडियोज़ भेजकर सांप्रदायिक उन्माद भड़काया गया उसकी पूरी साज़िश रची गई. पुलिस ने माना कि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे भड़काने के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप्स का इस्तेमाल किया गया. गौ रक्षक, जाट आंदोलनकारी, और कश्मीर में प्रदर्शनकारी भी इन व्हाट्सऐप ग्रुप का फ़ायदा उठाकर अपने प्रदर्शनों के लिए लोग जुटाते हैं या उपद्रव मचाते हैं. ऐसी स्थितियों में सरकार इंटरनेट बैन करने का क़दम उठाती है, और दुनिया भर में इंटरनैट बैन करने के मामलों में भारत सबसे अव्वल है. फ़ौरी तौर पर होने वाली हिंसा को रोकने में जहां ये क़दम कारगर साबित हो सकते हैं, वहीं 24 घंटे और सातों दिन तथ्यहीन किस्से, बिगड़े हुए सच और फ़र्ज़ी वीडियो आदि के ज़रिए नफ़रत की जो ज़मीन तैयार की जा रही है उससे निपटने के लिए कुछ नहीं हो रहा, जबकि सबसे बड़ी चुनौती यही है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ ग़रीब और कम पढ़े-लिखे लोगों को ही व्हाट्सऐप पर राजनीतिक प्रोपैगेंडा साधने वाली इन काल्पनिक और मनगढ़ंत बातों को मानने का ज़िम्मेदार ठहराया जाए . पढ़ा-लिखा संपन्न वर्ग भी इसका उतना ही बड़ा क़सूरवार है. बड़े नामी बीबीसी पत्रकार फ़र्गल कीन ने रवांडा के नरसंहार में शामिल हत्यारों पर अपनी बात रखते हुए कहा था: “कुछ ने ख़ुद को सच्चे जुनूनी लोगों के तौर पर पेश किया. उन्होंने दूसरे संप्रदाय के लोगों के लिए भड़काऊ बातें कहीं और ऐसा कर अनपढ़ ग्रामीणों के मन में तुत्सियों के प्रति आसानी से नफ़रत पैदा कर दी गई. सबसे ज़्यादा भड़काऊ बातें करने वाले जिन लोगों से मैं मिला, वो राजनीतिक वर्ग से आने वाले पढ़े-लिखे और संपन्न लोग थे, जो नफ़ासत से जीते थे और धाराप्रवाह फ़्रेंच बोलते थे, जो युद्ध और जनतंत्र पर दार्शनिकों की तरह घंटों लंबी बहसें कर सकते थे. लेकिन सिपाहियों और ग्रामीणों की तरह उनके हाथ भी अपने ही साथी देशवासियों के ख़ून से सने थे.”

रवांडा ने हमें एक सबक़ दिया है, पर ये काम का तभी साबित होगा जब हम उस पर कान देंगे.

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