22 अग॰ 2015

मांझी द माउंटेन मैन: शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद

बायोपिक बॉलीवुड में बहुत कम बनते हैं और जो बनते भी हैं भी हैं उनमें से ज़्यादातर में प्रोपैगैंडा की बू आती है. मुझे याद आने वाली आख़िरी बायोपिक भाग मिल्खा भाग है जिसमें मिल्खा सिंह को वास्तविक के बजाय अद्भुत बनाने का यत्न करते हुए फ़रहान अख्तर को इस क़दर बलिष्ठ बनाया गया कि वो किसी भी कोण से मिल्खा लगते ही नहीं. जबकि वह फिल्म मांझी, द माउंटेन मैन से ज़्यादा सत्यता और प्रमाणिकता का दावा करती है.

बहरहाल लौटकर आते हैं उस पगले पहाड़तोड़ुए पर जिसके जीते जी न तो मीडिया ने उसका संज्ञान लिया, न लोगों ने और न ही सरकार ने. केतन मेहता और उनकी पूरी टीम यह फ़िल्म बनाने के लिए बधाई के पात्र हैं. दशरथ मांझी के बारे में जितना पढ़ा-देखा और सुना है उस लिहाज़ से नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी दशरथ मांझी के किरदार को परदे पर उतारते हुए नहीं बल्कि उसे जीवंत करते हुए दिखते हैं.

दशरथ का किरदार इस फ़िल्म में बड़ा मासूम है, यह मासूमियत उसे पिटवाती है, प्रेम करवाती है, उदारवादी बनवाती है और यही मासूमियत उसे ताजमहल जितने ऊंचे पहाड़ को छैनी और हथौड़े जैसी अदनी चीज़ों से तोड़ डालने का हौसला भी देती है. फ़िल्म आपको यक़ीन करवाती है कि दशरथ मांझी असल में भी ऐसे ही होंगे. न होते तो पहाड़ तोड़ने का फ़ैसला तो नहीं करते और अगर करते भी तो उन पर सवार धुन बाईस सालों तक टिकी नहीं रह पाती.

मांझी द माउंटेन मैन को एक लाइन में समझााना हो तो गांधी का वह उद्धरण याद कीजिए, "पहले वे आपको नज़रअंदाज़ करेंगे, फिर वे आप पर हँसेंगे, फिर वे आपसे लड़ेंगे, फिर आपकी जीत होगी."

जो बात फ़िल्म के एक दृश्य में मांझी को एक पत्रकार बाबू कह रहे होते हैं, वही बात आप इस फिल्म के लिए कह सकते हैं कि आख़िर इतनी मूल्यवान बातें फिल्म में इतनी सहजता से कैसे कहलवाई गई, जैसे - हम तो यही कहेंगे कि भगवान भरोसे मत बैठिए, क्या पता वो भी आपही के भरोसे बैठा हो; या फिर, हम तो सोचे थे तुम (ये पहाड़ तोड़कर) हमारे वास्ते एगो ताजमहल बना रहे हो.

ये कमाल ही है कि हम तुम्हारे हैं सनम में एक कठघोड़े से बात करते हुए जज़्बाती हो रहे शाहरुख के उस दृश्य पर आज भी आपको हंसी आती है, जबकि पहाड़ से बातें करते हुए मांझी आपको बिलकुल असली लगते हैं. पहाड़ के साथ तक़रार से शुरू हुआ उनका रिश्ता भी इन दो घंटों में कई आयामों से होकर गुज़रता है. पहाड़ खुद भी एक किरदार है इस फ़िल्म में, पहले फ़गुनिया की जान लेता है, फिर मांझी का इम्तिहान, ज़रुरत पड़ने पर उसकी प्यास मिटाता है और जैसे ही मांझी  उसे अपना पकिया यार बताते हैं, साँप से डंसवाकर उन्हें वास्तविकता में ले आता है, मानो कह रहा हो, "यारी मत करो, अपना काम करो मांझी."

कई दफ़े मांझी में वो जायज़ गुरूर भी दिखता है जिसका इस्तेमाल वे गाहे-बगाहे करते हैं. एक बार पत्रकार के ये जतलाने पर कि अपना अखबार निकालना कितना मुश्किल है, वे कहते हैं- पहाड़ तोड़ने से मुश्किल काम है क्या, और दो एक बार अलग-अलग किरदारों को हड़काने के लिए- हम पहाड़ तोड़ दिए, तुम्हारा माथा भी तोड़ सकते हैं.

यह फिल्म अगर बायोपिक न होकर फ़िक्शन भी होती तो भी वैसी ही रहती - सानदार, जबरजस्त, ज़िंदाबाद; लेकिन चूंकि कहानी मौलिक है इसलिए इसका क़द और ऊंचा हो जाता है. जहां फ़िक्शन की गुंजाइश थी, वहां केतन निराश नहीं करते फिर चाहे वह दशरथ और फगुनिया की प्रेम कहानी हो, ज़मींदारी और जातिप्रथा की बुनावट हो या प्रशांत नारायणन के झुमरू वाले किरदार का माओवादी बन जाना हो.

फिल्म में विमर्श के नाम पर भी केतन मेहता ने दर्शकों को बहुत कुछ दिया है. इसके केंद्र में दलित विमर्श तो है ही, उसके इर्द-गिर्द स्त्रीवाद भी है जब फ़गुनिया (जिसका किरदार राधिका आप्टे ने भी उतनी ही ख़ूबसूरती से निभाया है) अपने पति मांझी से इसलिए लड़ बैठती है कि दशरथ को ज़मींदार और फगुनिया के बीच हुई झड़प में नहीं पड़ना चाहिए था कि वो अपनी लड़ाई खुद भी लड़ सकती है. फिल्म के कुछ संवाद ईश्वरीय सत्ता के विरुद्ध ललकार भी हैं लेकिन इतने सटल तरीके से कि आपकी भावनाएं ठेस खाने से बच जाती हैं.

लेकिन कई भावनाओं को ये फिल्म जस का तस परदे पर उतार देती है, बिना किसी लाज-समाज के. प्रेम में पड़ जाने के बाद विरह में देह कितना बेताब हो जाता है और कर देता है, नवाज़ से बेहतर परदे पर अब तक शायद ही किसी ने इतनी सरलता और सहजता से उतारा हो.

कुछ दृश्य बेहद चमत्कारी हैं, मसलन जहां से फिल्म शुरू होती है. मांझी की ललकार में ही, पहले ही दृश्य में आप उस चरित्र की प्रतिबद्धता भांप लेते हैं. महज़ संवाद अदायगी के दम पर. या वह दृश्य जहां झुमरू अपनी बीवी का शवदाह करता है; कोई सौगंध उठाने का ड्रामा नहीं, चूं भर भी संवाद नहीं, फिर भी एक-एक बात पानी की तरह साफ़.

जब दिल्ली के अपने पैदल मार्च में आगरा पहुंचकर इत्तिफ़ाक़न उनकी नज़र ताजमहल पर पड़ती है तो उनके चेहरे पर उमड़ने वाला भाव इतना असली होता है कि आप कुछ पल के लिए ठहर-से जाते हैं. पर मांझी के पास वक़्त की किल्लत है. उन्हें दिल्ली पहुंचना है, और उन्हें पता है कि 'दिल्ली दूर है', वापिस भी लौटना है और पहाड़ भी तोड़ना है इसलिए वे मोह में नहीं पड़ते, चलते चले जाते हैं.

बाकी तिग्मांशु धूलिया और पंकज त्रिपाठी ज़मींदार और उनके बेटे रुआब के किरदार के बारे में जितना कहा जाए कम है, लेकिन उनकी बातें बाक़ी फिल्मों के बहाने करेंगे. इसे बस नवाज़ के लिए छोड़ दीजिए.

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हमारे टॉम हैंक्स हैं और ये फिल्म ऑस्कर जीतने का माद्दा रखती है बशर्ते हम भेजें.    

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