16 मई 2015

स्याह सुनसान रातें, और कुछ ग़मनाक़ बातें

किसी की कविता का अनुवाद तब तक ईमानदार नहीं माना जाना चाहिए जब तक आप ख़ुद कवि से मिले न हों, जाना न हो कि हर पंक्ति को लिखते हुए उनके दिल और ज़हन में क्या चल रहा था. पाब्लो नेरुदा की कविता टुनाईट आई कैन राइट द सैडेस्ट लाइंस का ये अनुवाद मैंने ही किया है, पर इसे अनुवाद से ज़्यादा मैं ये मानूंगा कि उनकी कविता को मैं कितना समझ पाया. पढ़ें और वक़्त हो तो अपनी राय भी दें.    


आज की रात, मैं लिख सकता हूँ सबसे ग़मनाक़ बातें,
कि किस क़दर टूटकर चूर हो चुकी हैं ये रातें,
कि दूर झिलमिलाते तारे किस तरह ठिठुरकर कांपते हैं.
कि सर्द हवा आसमान में गोते लगाती है 
और कोई दर्दज़दा गीत गाती है.
आज की रात, मैं लिख सकता हूँ सबसे ग़मनाक़ बातें,
कि उससे मुझको प्यार था, कभी-कभार उसको भी था मुझसे.
ऐसी ही कई रातों को, इन्हीं बांहों में, समेटकर रखा था उसे,
जब ख़त्म होता ही नहीं था मेरा चूमना उसको,
न ख़त्म होने वाले आसमां के तले.
उसे भी मुझसे मोहब्बत थी कभी-कभी ही सही, और मुझको भी उससे.
उन तिलस्मी ठहरी हुई आँखों में बिना उतरे कोई रहे भी तो कैसे.
आज की रात, मैं लिख सकता हूँ सबसे ग़मनाक़ बातें,
ये एहसास कि अब वो मेरे पास नहीं. उसे खो देने की ख़लिश.
ये स्याह सुनसान रातें, उसके होने पर यूं न होती थीं.
उसका छूना, जैसे लफ्ज़ रूह को, ओस दूब को छूती हो.
जो भी हो क्या फ़र्क पड़ता है,
कि नाकाम मोहब्बत उसे रोक न सकी.
इस स्याह रात में वो मेरे साथ नहीं.
कहने को अब कुछ भी नहीं.
कोई गा रहा है कहीं दूर बैठा.
और रूह धुनों से दूर,
उसे खो देने की ख़लिश में डूबी है.
मेरी नज़रें यूं तलाशती है उसे,
मानो चली जाएँगी ये जिस्म छोड़कर, उसके पास.
दिल ढूंढ़ता है हर तरफ़, पर वो मेरे साथ नहीं.
वही रातें जो तब इन्हीं पेड़ों को रौशन कर दिया करती थीं,
आज स्याह और सुनसान हैं.
यकीनन मैं अब उसकी मोहब्बत में नहीं, पर जो था उसका क्या.
मेरी आवाज़ काश हवाओं के सहारे पड़ जातीं उसके कानों में.
यकीनन मैं अब उसकी मोहब्बत में नहीं, पर शायद होऊँ भी.
मोहब्बत में वक़्त गुज़र जाता है, भुलाने में पूरी उम्र
क्योंकि, ऐसी ही कई रातों में, इन्हीं बांहों में, समेटकर रखा था उसे,
मेरी रूह को यकीन नहीं कि उसे खो चुकी है ये.
शायद ये आख़िरी दर्द हो जो मुझको देगी वो,
शायद ये आख़िरी लफ्ज़ हों, जो उसके नाम लिक्खूँ मैं.

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