08/07/2017

GST: देर आए पर क्या दुरुस्त भी?

15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश की आज़ादी का ऐलान आधी रात को संसद में किया था. ऐसा मौक़ा फिर तो आएगा नहीं, सो बीजेपी ने GST बिल पास करते हुए ही अपना वो शौक पूरा कर लिया. ये कोई ऐतिहासिक महिला आरक्षण विधेयक नहीं था. देवगौड़ा सरकार ने 1996 में महिला आरक्षण विधेयक इंट्रोड्यूस किया था, 2010 में ये राज्य सभा में पास हुआ. लेकिन तीन दशक होने को हैं, ये विधेयक लोक सभा में टेबल तक नहीं हो पाया है. लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की 33% यानी एक तिहाई भागदारी पक्की करने वाला ये विधेयक पास हो पाता तो समझ में आता मौक़ा ऐतिहासिक है

लेकिन GST में क्या ऐतिहासिक है? जिस देश की साठ फ़ीसद से ज़्यादा बड़ी आबादी के पास शौचालय की सुविधा नहीं है, उसे इस बात से क्या मतलब कि टॉयलेट पेपर पर कितना टैक्स लगेगा और दुकान पर वो उन्हें कितने में मिलेगा

हमारा देश भले ही सामाजिक ‘हताशा’ के दौर से गुज़र रहा हो, पर न्यूज़ मीडिया की मानें तो आर्थिक सुधारों की दिशा में ‘एक देश, एक कर’ की नीति के ज़रिए हमने तरक्की की तरफ़ एक और क़दम बढ़ा लिया है. यहां थोड़ा specific हों तो हमारा जीएसटी यूरोपीय देशों की तरह वन टैक्स सिस्टम पर नहीं बल्कि कनाडा की तरह डुअल टैक्स सिस्टम पर आधारित है. सही-सही कहा जाए तो ये ‘वन नेशन, टू टैक्स’ है. मतलब टैक्स दो हिस्सों में बंटा होगा, एक हिस्सा केंद्र जबकि दूसरा राज्य सरकार के पास जाएगा. CGST और SGST – Center and State. अच्छी बात ये है कि अब कारोबारियों को हर क़दम पर अलग-अलग तरह के करों से छुटकारा मिल जाएगा. पर इस टैक्स सिस्टम का देश की जनता के को कितना फ़ायदा मिलेगा?

अमेरिका को छोड़कर लगभग हर संपन्न देश में GST या VAT जैसा युनिफाइड टैक्स सिस्टम है. अब इससे अर्थ जगत की ज़्यादा समझ न रखने वालों को यही लगेगा कि बड़ा अच्छा काम हुआ, बड़ा ज़रूरी काम हुआ. लेकिन आपको साथ ही ये भी जानना चाहिए कि GST वाले किसी भी देश में अधिकतम टैक्स स्लैब 28% नहीं है. बल्कि प्रति व्यक्ति आय में ऊपर के देशों में शुमार डेनमार्क की मिसाल लें, जहां कमाने वाले हर शख्स को आयकर भरना पड़ता है, वहां भी GST की दर 25% है. जबकि भारत में दो लाख या उससे कम की कमाई करने वाले को आयकर नहीं देना पड़ता. भारत एक ग़रीब देश है, ऐसे में टैक्स का स्लैब इतना ज़्यादा कैसे? 

हमारी सरकार बचाव में दलील देती है कि आम इस्तेमाल की ज़रूरी चीज़ों के लिए और आम लोगों की जेब पर ज़्यादा भारी न साबित होने के लिए टैक्स को चार स्लैब में बांटा गया है. 0-5%, 12%, 18% और 28%. पर ये एक झांसा है. महज़ एक दिखावा. क्योंकि 60 फीसदी उत्पाद अधिकतम स्लैब 18 और 28% के ब्रैकेट में डाले गए हैं. केरोसीन और कोयला जो अब चलन से बाहर होने की कगार पर हैं, अगरबत्ती और पतंग, डाक टिकट, 1000 रुपये से कम के कपड़े, और पांच सौ रुपये से कम की चप्पलों, और आश्चर्यजनक रूप से काजू और किशमिश पर 5% का टैक्स होगा. अब आप नोटिस कीजिए तो काजू किशमिश को छोड़कर इन कैटेगरी में जो ज़्यादातर चीज़ें डाली गई हैं, उनकी मौजूदा क़ीमतें वैसे भी बहुत ज़्यादा नहीं हैं. तो बेसिकली जिसे सरकार मौलिक ज़रुरत की चीज़ें बताकर 5% के स्लैब में रखने का दंभ भर रही हैं, वो सरकारी ख़ज़ाने के लिहाज़ से यूँ भी मुनाफ़ेमंद नहीं हैं.

अधिकतम ब्रैकेट यानी 28% वाला स्लैब, जिसे ‘सिन टैक्स’ कहते हैं, मतलब ‘अय्याशी की कीमत’ चुकाना...ये कायदे से सिर्फ लग्ज़री आइटम्स पर लागू होना चाहिए, वो चॉकलेट, चुइंगम, शैम्पू, डियोड्रेंड और पेंट्स जैसी आम इस्तेमाल की चीज़ों पर भी लागू हैं. सरकार बड़ी आसानी से तय कर लेती है कि क्या अय्याशी है और क्या ज़रूरत. अगर इन चीज़ों को सरकार सिन-टैक्स के दायरे में रखती है तो हवाई यात्रा पर सिर्फ़ पांच प्रतिशत का टैक्स कैसे है? कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली ने इसी बाबत एक बड़ा मजेदार सवाल पूछा कि ‘किटकैट बिस्किट है या चॉकलेट?’, क्योंकि बिस्किट पर 18% का टैक्स है और चाकलेट पर 28%.

GST को साकार करने में सोलह साल लगे. साल 2000 में NDA की ही वाजपेयी सरकार में इसकी कवायद शुरू हुई थी. इससे पहले की वो सरकार GST पास करवा पाती, 2005 में UPA की सरकार बन गई. मनमोहन सिंह वाली सरकार ने हालांकि GST को ठंडे बस्ते में नहीं डाला बल्कि उस पर गंभीरता से काम करना शुरू किया. कई वित्तीय आयोग बने. तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तो 2010 के वित्तीय बजट में GST लागू करने तक का ऐलान भी कर दिया था. पर राह उतनी आसान नहीं थी. इसके लिए देश के सभी 29 राज्यों को मनाना था, और राज्य सरकारें कर-वसूली की अपनी आज़ादी या यूं कहें अपनी मनमानी खोना नहीं चाहती थीं.

तब बने वित्तीय आयोगों का सुझाव सभी तरह के करों को ख़त्म कर इसे फ्लैट 12% करने का था. इसमें पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और एलकोहल भी शामिल थे. ज़ाहिर है शुरुआत में राज्य के ख़ज़ाने पर इसका असर पड़ता. पर बदलाव बिना थपेड़े सहे तो नहीं होते! इस थोड़े नुकसान के लिए केंद्र और राज्य सरकारें सोलह साल में तैयार नहीं हुई, लिहाजा वाजपेयी के बाद आई यूपीए सरकार इसे लागू नहीं कर पाई. और दिलचस्प पहलू ये है कि आज भी केंद्र और राज्य सरकारें इस थोड़े नुकसान के लिए तैयार नहीं हैं, जिस वजह से आप चुइंगम को 28% वाले ब्रैकेट में देख रहे हैं. पेट्रोलियम उत्पाद जो मोटे तौर पर एक राज्य से दूसरे राज्य जाने वाले सामानों की क़ीमत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं, और शराब जिससे राज्य मोटी कमाई करते हैं, को GST के दायरे से बाहर रखा गया है. अब इसके पीछे दो ही तर्क समझ में आते हैं. एकमोदी सरकार को अगले चुनाव से पहले GST लागू करने का श्रेय लेना ही था, दूसराइरादा इतना मज़बूत था कि राज्य सरकारों की किसी भी शर्त पर राज़ी होने के लिए ये सरकार तैयार थी.

मौजूदा वित्तीय सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन की सलाह अधिकतम दर 20% रखने की थी. उन्होंने कहा था कि GST एक मौक़ा है दूरदर्शी फ़ैसले लेने का, बदकिस्मती से फ़िलहाल GST का फैसला सिर्फ फैसला लेने का दिखावा भर है.

कुछ चीज़ों को लेकर तो कोई तर्क समझ ही नहीं आता. मसलन काजू-किशमिश पर पांच फ़ीसदी टैक्स, लेकिन बादाम और दूसरे dry nuts पर 12%. साबुन और हेयर आयल पर 18% का टैक्स, लेकिन डिटर्जेंट पर 28%. सिनेमा घरों में अगर आप 100 रुपये की सीट वाला टिकट लेंगे तो 18% टैक्स लगेगा, और उसके ऊपर की सीटों पर 28%. अब आज के ज़माने में ऐसे मल्टिप्लेक्स हैं ही कितने जहां सौ रुपये से कम में टिकट मिलते हों…?  

जिस तरह नोटबंदी के फ़ैसले में तैयारियों की कमी साफ़ दिखीं, वैसे ही GST के बाद मध्यमवर्गीय लोगों को महंगाई का पुरज़ोर सामना करना पड़ेगा. तब डिजिटल मनी को अपनाने की मोदी जी की अपील स्मार्टफ़ोन्स रखने वाले युवाओं पर तो हो सकtee है, लेकिन ATM की क़तारों में सिर्फ़ yuvaa खड़े नहीं होते. ठीक उसी तरह भारत में लघु-मध्यम कारोबारियों का एक बड़ा वर्ग आज भी बही-खातों और हाथ से हिसाब करके काम चलाता है, और बिना किसी ट्रायल रन, वर्कशाप और सेमिनार के उनके लिए एकदम से नये सिस्टम में शामिल होना आसान नहीं होगा.


लान्च कार्यक्रम में मोदी जी नेगुड्स ऐंड सर्विसेज़टैक्स कोगुड ऐंड सिंपलटैक्स का नाम दिया. आने वाले वक्त में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों के साथ शायद येगुड ऐंड सिंपलबन जाए, लेकिन फ़िलहाल It’s not so good and not so simple for so many who are not part of the structured and well-organised business community.  

29/03/2017

जब नाश मनुज पर छाता है...

द इंडियन एक्सप्रेस से लिए गए इस आलेख में सुशांत सिंह बता रहे हैं कि कैसे रवांडा से मिले सबक़ को याद करें तो व्हाट्सऐप पर तेज़ी से फैल रहे नफ़रत भरे संदेशों को लेकर चिंतित होना लाज़िमी है.

व्हाट्सऐप के ज़रिए हमें जो फ़र्ज़ी मैसेजेज़, ज़हर उगलते वीडियोज़ मिल रहे हैं, उन्हें अप्रासंगिक क़रार देकर सीधा ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
साल 1994, देश रवांडा. 12 हफ़्तों के दौरान यहां हुतु समुदाय के लोगों ने तुत्सी समुदाय के क़रीब आठ लाख लोगों की हत्या की थी. इसे आधुनिक युग का सबसे ख़तरनाक़ नरसंहार माना जाता है. हिंसा के इस दौर में वहां के एक प्राइवेट रेडियो-टेलिविज़न लिब्रे दस मिल कालिन्स (RTLMC) पर प्रचारित नारा था - सारे क़ब्रिस्तान अभी भरे नहीं हैं.  हालांकि इस नरसंहार की जड़ें रवांडा के औपनिवेशिक इतिहास में समाई हुई हैं, लेकिन नफ़रत की इस आग को हवा देने का काम मीडिया ने किया था, ख़ास तौर पर रेडियो ने. रवांडा के नरसंहार को भड़काने और फैलाने में मीडिया एक ताक़तवर हथियार साबित हुई.

23 साल बीत चुके हैं, और भारत अभी रवांडा बनने से कोसों दूर है, लेकिन उस दौरान मिले सबक़ आज की परिस्थिति में बहुत बड़ी अहमियत रखते हैं. आज व्हाट्सऐप या दूसरे डिजिटल मंचों के ज़रिए हमें जो फ़र्ज़ी मैसेजेज़, ज़हर उगलते वीडियोज़ और दूसरे समुदायों को केंद्रित कुतर्की उपहास मिल रहे हैं, उन्हें अप्रासंगिक क़रार देकर सीधा ख़ारिज नहीं किया जा सकता. शत्रुता फैलाने की ये सधी-अनसधी कोशिशें बदक़िस्मती से एक भयावह वक़्त का दस्तक जान पड़ती हैं. ये मैसेजेज़ संप्रदायों के बीच नफ़रत फैलाने की एक बड़ी योजना के छोटे-छोटे पुर्जे हैं.

1990 के शुरुआती दौर से ही तुत्सी विरोधी आलेख और ग्राफ़िक कार्टून्स कंगूरा नाम के एक अख़बार में छपने लगे थे. जून 1993 में, रवांडा में RTLMC का प्रसारण शुरू हुआ था. यह रेडियो स्टेशन उपद्रव फैलाने का ज़रिया था. किसी भी दूसरे रेडियो स्टेशन की तरह ही इस पर भी आम बोलचाल की भाषा इस्तेमाल होती थी, डिस्क जॉकी हुआ करते थे, पॉप म्यूज़िक भी था और फ़ोनो भी लिए जाते थे. ये रेडियो स्टेशन बेरोज़गारों, गुंडा तत्वों और मिलिटेंट गैंग्स को लुभाने के लिए ही बना ही था. ब्रिटिश पत्रकार लिंडा मेलवर्न की मानें तो, “अनपढ़ लोगों की बहुत बड़ी आबादी के बीच उस रेडियो स्टेशन को जल्द ही एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग मिल गया जिन्हें वो चैनल बेहद दिलचस्प लगा.”

RTLMC के प्रसारण से जुड़े ट्रांसक्रिप्ट्स ड्यूक यूनिवर्सिटी के इंटरनैशनल मॉनिटर इंस्टिट्यूट में उपलब्ध हैं.  नरसंहार को रंग देने के रेडियो स्टेशन के उन प्रयासों पर तब से काफ़ी अध्ययन हुए हैं. यह चैनल लोगों से “काम पर जाने” को कहता था और सबको पता था कि काम पर जाने का मतलब है हथियार उठाना और तुत्सियों की हत्या करना. लेकिन जो चीज़ इन अध्ययनों से बचकर निकल गईं वो थी इस रेडियो स्टेशन के काम करने का तरीक़ा - ये तुत्सियों को हैवान बताता था, साथ ही नफ़रत और हिंसा को बढ़ावा देता था - ऐसा कर इस रेडियो स्टेशन ने रवांडा में लोगों के बीच नरसंहार की ज़मीन तैयार की.

ये ट्रांसक्रिप्ट्स ख़ुलासा करते हैं कि RTLMC रवांडाई इतिहास को अपने हिसाब से गढ़ने की कोशिश कर रहा था और उनके रचे इतिहास में सत्य और तथ्य की कोई जगह नहीं थी. इस इतिहास पर कट्टरपंथी हुतु अतिवादियों का एकाधिकार था.  सच्चाई को ऐसी कहानियों से बदल दिया गया कि जिसके चलते इस नरसंहार को सही ठहराने का आधार मिल गया. “दासता” शब्द का इस्तेमाल इन ट्रांसक्रिप्ट्स में बार-बार देखने को मिलता है, रेडियो स्टेशन पर बुलाए गए लोग औपनिवेशिक काल का वो दौर याद करते थे जब देश भर में हुतु समुदाय को दास बनाकर रखा जाता था. ऐसी शब्दावलियों का इस्तेमाल कर रेडियो स्टेशन ने रवांडाई नरसंहार को दास विरोधी आंदोलन का जामा पहनाया. हुतु समुदाय के लोगों को लगा कि RTLMC उनके सामने सच्चे इतिहास पर से पर्दा उठाने और उन्हें उनके असली अतीत से दो-चार करवाने के लिए आया है. ये कहानी वहां राज कर चुके अंग्रेज़ों और वहां के स्थानीय लोगों द्वारा बताए गए इतिहास से बिल्कुल अलग था.

अगर तब के दौर में रेडियो इतना ताक़तवर ज़रिया था, जहां आपको बस एक ट्रांज़िस्टर और कुछ बैटरियों की ज़रूरत थी, तो आज तो हम सबके पास स्मार्टफ़ोन्स हैं, व्हाट्सऐप है. ज़हर उगलते मैसेजेज़ की भरमार RLTMC की उसी कहानी का प्रतिबिंब मालूम पड़ती है. इतिहास के एक नये संस्करण को गढ़ने की कोशिश. वक़्त देकर सलीके से बनाए गए इन उपहास उड़ाने वाले क्लिप्स, वीडियोज़ और मैसेजेज़ की शक़्ल में नफ़रत, अपशब्द और ख़ुद के ऊपर हुए ‘कथित अत्याचार’ से भरे जो क़िस्से हमें परोसे जा रहे हैं वो सियासी हरक़तों को सही ठहराने का आधार मुहैया करते हैं. ऐसी कुछ कहानियों में नेहरू का ऐड्स से मरना, 2000 रुपये के नये नोटों में सैटेलाइट ट्रैकिंग चिप का लगा होना शामिल हैं - चाहे कितने भी बड़े कुतर्क हों, लेकिन इनका काम करने का तरीक़ा ही यही है. जिसे हम कुतर्क मानते हैं वो एक बड़े वर्ग को सच पर से पर्दा उठाने जैसा लगता है. ये कुछ कुछ नाइजीरिया के उस ईमेल घोटाले जैसा है जिसके तहत आपको जानबूझकर करोड़ो रुपये का झांसा देने वाले ईमेल भेजे जाते हैं, और इन झांसों में फंसने का सारा दारोमदार ख़ुद आप पर होता है. जब कोई फ़र्ज़ी व्हाट्सऐप मैसेज ख़बरिया चैनलों की सुर्ख़ियां बनता है तो इससे साफ़ होता है कि हममें से कई इन झांसों में फंसे हैं और हमें इन पर यक़ीन करने से पहले सत्य और तथ्य की पड़ताल करनी चाहिए.  

टेक्नोलॉजी आदर्श और सिद्धांतों पर नहीं चलती. ये इन मूल्यों को लेकर निरपेक्ष होती है. यानी इसका ऐक्सेस किसे मिलेगा - नफ़रत फैलाने वाले को या प्यार फैलाने वाले को - ये तय नहीं किया जा सकता. और यही चीज़ जो व्हाट्सऐप को लोकप्रिय बनाती है, इसे रेडियो, ट्विटर या फ़ेसबुक से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक़ भी बनाती है. यहां आप ख़ुद ही शिकार बनते हैं. इस मंच ने नफ़रत फैलाने वाले मैसेजेज़ को आगे बढ़ाना बेहद आसान बना दिया है, लोग आसानी से डियो या वीडियो मैसेज रिकार्ड कर एक चुनिंदा ग्रुप को भेज सकते हैं. एक बटन दबाते ही जुनून और जोश से भरे ये भड़कीले और तथ्यहीन मैसेजेज़ चुनिंदा और कुछ हद तक मिलती-जुलती सोच वाले लोगों तक पहुंच जाते हैं और उन लोगों के ज़रिए ये पलक झपकते ही वायरल हो जाते हैं.

पिछले कुछ सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जिनमें व्हाट्सऐप पर फ़र्ज़ी वीडियोज़ भेजकर सांप्रदायिक उन्माद भड़काया गया उसकी पूरी साज़िश रची गई. पुलिस ने माना कि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे भड़काने के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप्स का इस्तेमाल किया गया. गौ रक्षक, जाट आंदोलनकारी, और कश्मीर में प्रदर्शनकारी भी इन व्हाट्सऐप ग्रुप का फ़ायदा उठाकर अपने प्रदर्शनों के लिए लोग जुटाते हैं या उपद्रव मचाते हैं. ऐसी स्थितियों में सरकार इंटरनेट बैन करने का क़दम उठाती है, और दुनिया भर में इंटरनैट बैन करने के मामलों में भारत सबसे अव्वल है. फ़ौरी तौर पर होने वाली हिंसा को रोकने में जहां ये क़दम कारगर साबित हो सकते हैं, वहीं 24 घंटे और सातों दिन तथ्यहीन किस्से, बिगड़े हुए सच और फ़र्ज़ी वीडियो आदि के ज़रिए नफ़रत की जो ज़मीन तैयार की जा रही है उससे निपटने के लिए कुछ नहीं हो रहा, जबकि सबसे बड़ी चुनौती यही है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ ग़रीब और कम पढ़े-लिखे लोगों को ही व्हाट्सऐप पर राजनीतिक प्रोपैगेंडा साधने वाली इन काल्पनिक और मनगढ़ंत बातों को मानने का ज़िम्मेदार ठहराया जाए . पढ़ा-लिखा संपन्न वर्ग भी इसका उतना ही बड़ा क़सूरवार है. बड़े नामी बीबीसी पत्रकार फ़र्गल कीन ने रवांडा के नरसंहार में शामिल हत्यारों पर अपनी बात रखते हुए कहा था: “कुछ ने ख़ुद को सच्चे जुनूनी लोगों के तौर पर पेश किया. उन्होंने दूसरे संप्रदाय के लोगों के लिए भड़काऊ बातें कहीं और ऐसा कर अनपढ़ ग्रामीणों के मन में तुत्सियों के प्रति आसानी से नफ़रत पैदा कर दी गई. सबसे ज़्यादा भड़काऊ बातें करने वाले जिन लोगों से मैं मिला, वो राजनीतिक वर्ग से आने वाले पढ़े-लिखे और संपन्न लोग थे, जो नफ़ासत से जीते थे और धाराप्रवाह फ़्रेंच बोलते थे, जो युद्ध और जनतंत्र पर दार्शनिकों की तरह घंटों लंबी बहसें कर सकते थे. लेकिन सिपाहियों और ग्रामीणों की तरह उनके हाथ भी अपने ही साथी देशवासियों के ख़ून से सने थे.”

रवांडा ने हमें एक सबक़ दिया है, पर ये काम का तभी साबित होगा जब हम उस पर कान देंगे.

17/11/2016

ये जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने भारतीय सेना को पाकिस्तान-सा नहीं बनने दिया

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विरासत पर अक्सर दो चीज़ों को लेकर तोहमत लगाई जाती है. एक है कश्मीर मुद्दा और दूसरा चीन से भारत को मिली करारी शिकस्त. हाल के सालों में भी बार-बार नेहरू की इन दो कथित नाकामियों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देकर ये बात स्थापित करने की कोशिश की गई है कि नेहरू ने सेना को वो अहमियत नहीं दी जो दी जानी चाहिए. इंडियन एक्सप्रेस के एक आलेख में एक पूर्व सेनाधिकारी सुशांत सिंह ने सीधे तौर पर इसे सच से कोसों दूर तो बताया ही है, साथ ही उन्होंने कहा है कि इतिहास में नेहरू को ज़्यादा ही उदार बताने के चक्कर में उनकी जो कट्टर युद्धविरोधी छवि पेश की गई है, उससे भी नेहरू को लेकर एक गुमराह करने वाला नज़रिया पैदा हुआ है. सेना के नाम पर राष्ट्रवाद और देशभक्ति की कथित राजनीति करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नेहरू ही थे जिन्होंने सेना पर सिविल अथॉरिटी की मज़बूत पकड़ और नियंत्रण की बुनियाद रखी. वरना आज भारत भी उन देशों की सूची में शुमार होता जहां सिविल प्रशासन बस दिखावा है और सेना के पास असली ताक़त है. नज़ीर के तौर पर हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान. ये नेहरू ही थे जिन्होंने भारत को पाकिस्तान जैसा नहीं बनने दिया. उसी आलेख का अनुदित रूप.



आज़ादी से काफ़ी पहले सितंबर 1946 में जब कांग्रेस की अंतरिम सरकार और मुस्लिम लीग के सदस्यों ने ब्रिटेश गवर्न्मेंट के साथ मिलकर काम करना शुरू किता ताकि भारत और पाकिस्तान के हाथ सत्ता की बागडोर सौंपी जा सके, तब के वायसराय माउंटबेटन की एग्ज़्यूकिटिव काउंसिल के वाइस प्रसिडेंट पद की शपथ दिलाई गई, भारतीय नज़रिए से उस पद को प्रधानमंत्री का नाम भी दिया जा सकता है.

ये पद पाते ही सबसे पहला क़दम जो नेहरू ने उठाया वो था काउंसिल में बतौर रक्षा सदस्य शामिल सेना के कमांडर इन चीफ़ को हटाना, बता दें कि कमांडर इन चीफ़ का दर्जा तब रक्षा मंत्री का हुआ करता था. उसकी जगह नेहरू ने सिविल लीडर सरदार बलदेव सिंह को बतौर रक्षा मंत्री काउंसिल में शामिल किया. और ऐसा नहीं था कि ये फ़ैसला पलक झपकते ले लिया गया था. देश को आज़ादी मिलने से सालों पहले से भारतीय राष्ट्रवादी और कांग्रेस पार्टी इसकी मांग कर रहे थे. सेना को मज़बूती के साथ नागरिक सरकार के अधीन रखने की सिफ़ारिश मोती लाल नेहरू कमिटी ने 1928 में ही की थी. इस सिफ़ारिश में कहा गया था कि काउंसिल में रक्षा सदस्य के तौर पर सिविल नेता होना चाहिए न कि सेनाधिकारी.

जवाहर लाल नेहरू सिर्फ़ बलदेव सिंह को इस काउंसिल में शामिल कर चुप नहीं बैठे. उन्होंने तुरंत तत्कालीन कमांडर इन चीफ़ को भारतीय सेना का राष्ट्रीयकरण करने के लिए फ़ौरी तौर पर कुछ सुझावों पर अमल करने का काम सौंपा. मोतीलाल नेहरू कमिटी ने एक और सिफ़ारिश की थी कि सेना के अधिकारियों की भर्ती इस तरह से की जाए की वहां समाज के हर तबके और वर्ग के लोगों की मौजूदगी हो. तब की सेना ब्रिटिश सरकार के अधीन काम कर चुकी थी और ऐसे में सेना में एक देश के तौर पर भारत के लिए वफ़ादारी, जिस देश को वो अपनी सेवा दे रहे हैं उसकी अहमियत और देश की महत्वाकांक्षाओं की समझ भरनी ज़रूरी था. और नेहरू ने ये काम काउंसिल का वाइस प्रसिडेंट बनते ही शुरू कर दिया. नेहरू की उस अंतरिम सरकार ने फ़ौरी तौर पर सिविल सुरक्षा बलों को अस्तित्व में लाने की प्रक्रिया शुरू की ताकि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सेना के इस्तेमाल से दूरी रखी जा सके. इसकी एक वजह सेना को घरेलू राजनीति से दूर रखना और सेना में राजनीति को न पनपने देना भी था. आज इन सिविल सुरक्षा बलों को आप पुलिस, CISF, CRPF वगैरह के तौर पर देख सकते हैं. नेहरू इस बात से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे कि किस तरह सेना के राजनीतिकरण ने यूरोप और जापान को प्रभावित किया और किस तरह ये प्रभाव World War II की वजह बना.

नेहरू की सोच जितनी सुलझी हुई थी, उनके आदेश उससे भी ज़्यादा सुलझे थे. भारत की आज़ादी की पूर्व संध्या पर भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर इन चीफ़ General Rob Lockhart ने आदेश दिया कि ध्वजारोहण समारोह से जनता को दूर रखा जाए. उस आदेश को तुरंत बर्ख़ास्त करते हुए नेहरू ने कहा, “सेना द्वारा बनाई गई कोई भी नीति अगर अमल में लाई जानी है तो उसमें भारत सरकार की सहमति अनिवार्य है. अगर किसी शख्स को इससे ऐतराज़ है तो उसके लिए भारतीय सेना में कोई जगह नहीं होगी."

सेना पर नागरिक सरकार की मज़बूत पकड़ के नेहरू अकेले पक्षधर नहीं थे. उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को भी इसका उतना ही श्रेय जाता है. जूनागढ़ रियासत के राजा ने अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान के अधीन होने का फ़ैसला किया था, और नेहरू ने इससे निपटने के लिए जूनागढ़ में भारतीय सेना की तैनाती के आदेश दिए. जब भारतीय सेना के ब्रिटिश चीफ़्स ने इस आदेश का
विरोध किया तो नेहरू के साथ-साथ पटेल ग़ुस्से से लाल हो गए थे. दोनों ने साफ़ तौर पर कहा कि अगर मिलिटरी कमांडर्स ने उनके आदेश को नहीं माना तो सरकार उन्हें सबक़ सिखाने में कोई कोताही नहीं करेगी. इसी घटना के बाद कैबिनेट की डिफ़ेंस कमिटी का गठन हुआ. राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सैन्य बलों को क्या करना है, इसके निर्देश इसी कमिटी द्वारा दिए जाने लगे. एक परंपरा जो आज भी क़ायम है.

Yale University के प्रफ़ेसर Steven Wilkinson की मानें तो नेहरू ने साल 1955 में एक ऐसा फ़ैसला किया जो देश में सेना के सर्वोपरि बनने की स्थिति पैदा होने की किसी भी गुंजाइश को ख़त्म कर देता. दरअसल ये वही साल था जब नेहरू ने भारतीय सेना के तीन टुकड़े किए, थल सेना, जल सेना और नौ सेना. इसके साथ ही तीनों सेना के अलग-अलग हेड बनाने का फ़ैसला हुआ और तीनों को
बराबर ताक़त दी गई. और तीनों के ऊपर रखा गया देश के राष्ट्रपति को. अगर तीनों सेना का हेड कोई आला सेनाधिकारी होता तो उसकी पावर इतनी बड़ी हो सकती थी कि प्रजातांत्रिक सरकार के लिए वो ख़तरा बन सके.

1950 के दशक के अंत में जब कृष्णा मेनन रक्षा मंत्री बनाए गए तब सेना पर नेहरू के रवैये की काफ़ी आलोचना हुई. ये वो दौर था जब थल सेना अध्यक्ष केएस थिमैया ने सितंबर 1959 में अपना इस्तीफ़ा दिया. इस्तीफ़े की वजह ये थी कि थिम्मैया ने सीमा पर चीन की बढ़ती दख़ल के बीच नेहरू से पाकिस्तानी जनरल अयूब ख़ान के उस प्रस्ताव को मंज़ूर करने की मांग की थी जिसके तहत दोनों
देशों भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त रक्षा इंतज़ामात किए जाते. दोनों नेहरू और मेनन इस आइडिया के ख़िलाफ़ थे. बात न बनने पर थिम्मैया ने इस्तीफ़ा दे दिया. नेहरू ने उन्हें मनाने की कोशिश ज़रूर की लेकिन ये साफ़ कर दिया कि उनके प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं मिलेगी. तब सेना ने नागरिक सरकार द्वारा उसकी कार्रवाइयों में दख़ल देने का आरोप लगाया और नेहरू ने भी साफ़ लहज़े में कहा, "Civil authority is and must remain supreme."

1962 में चीन से मिली करारी हार के बाद नेहरू की आलोचनाओं ने इतनी तेज़ी पकड़ ली और भारत की हार का ठीकरा सरकार पर इस क़दर फोड़ा गया कि सेना को सरकार पर वरीयता मिलने लगी. कई नेता सेना की उस मांग के आगे घुटने टेकते नज़र आए कि उन्हें सेना के संचालन से दूरी बनाए रखनी चाहिए. नौबत यहां तक आ गई कि जिस नेहरू ने सेना को नगरिक सरकार के नियंत्रण में
रखने की बुनियाद रखी उसी सेना के जनरल जयंतो नाथ चौधरी और उनके कमांडर सैम मानिकशॉ ने North Eastern Frontier Agency में सेना को मूव किए जाने के नेहरू के आदेश को दरकिनार कर दिया.
.
नेहरू के आख़िरी लम्हों में उन्हें भले ही सेना के कोप का शिकार बनना पड़ा हो, लेकिन जिस तरह के सिस्टम्स, नियम और संगठनात्मक संरचनाएं नेहरू ने अपनी सरकार रहते बना डाली थीं, उससे ये तय हो गया था कि भारत में सेना कभी नागरिक सरकार का तख़्तापलट करना तो दूर उसके समानांतर में भी खड़ी नहीं हो सकती. आज सेना की स्तुति गान कर और उसकी बहादुरी के नाम पर अपनी
रोटियां सेकने वाली सियासी पार्टियां अगर ऐसा कर भी पा रही हैं तो इसलिए कि वो कम से कम अपनी ही सेना से insecure नहीं है और पूरी तरह महफ़ूज़ है. जितनी भी post-colonial societies हैं उसमें सेना को मैनेज करने में भारत का नाम सबसे ऊपर है क्योंकि उस दौरान ऐसा कर भारत ने अपवाद पैदा किया था.

ये तय करना मैं आप पर छोड़ता हूं कि नेहरू द्वारा सेना की ताक़त को नागरिक सरकार के अधीन करने के लिए जो भी क़दम उठाए गए वो एक देश के तौर पर भारत को मज़बूत करता है या कमज़ोर. युद्ध के दो ही नतीजे हो सकते हैं हार या जीत. लेकिन नीतियां भविष्य तय करती हैं. कम से कम सेना के नज़रिए से देखें तो जो ठहराव इस देश में है, उसके लिए नेहरू को वो श्रेय तो दिया जी जाना
चाहिए जिसके वो हक़दार हैं.

04/11/2015

अधिकारी बनाकर नहीं सिपाही बनाकर ही मुमकिन है सेना में महिला-सशक्तिकरण

हाई स्कूल से लेकर कॉलेज तक अपने पांच साल मैंने एनसीसी में बिताए. यह पहला ऐसा मंच था जहां मुझे लड़कियों के साथ प्रशिक्षण पाने का मौक़ा मिला. जहाँ यह समझने का मौक़ा मिला कि लड़कियों को नाज़ुक, कमज़ोर और अबला मानने वाली धारणाएँ महज़ पूर्वग्रह है. जहाँ लड़कियों से भी उतनी ही कड़ी मेहनत करवाई जाती थी जितना लड़कों से और उन्हें भी सज़ा मिलने पर भारी राइफल उठाकर लड़कों की ही तरह मैदान के चक्कर लगाने पड़ते थे. मैंने खुद भी पैरासेलिंग और पैराग्लाइडिंग की है और उन्हें भी उसी दक्षता के साथ यह सब करते हुए देखा है. 

एनसीसी यानी नैशनल कैडेट कोर्प्स का गठन स्कूलों और कॉलेजों में भारतीय सेना में शामिल होने की तमन्ना रखने वाले विद्यार्थियों के लिए और आपातकालीन स्थितियों में सेना से जुड़े मानव-संसाधन संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था और सेना की ही तर्ज़ पर इसमें भी थल, जल और वायु तीनों इकाइयाँ होती हैं.

इस प्रशिक्षण के दौरान वे भी हमारे साथ फ़ायरिंग करती थीं, बाधा-दौड़ में भाग लेती थीं, सुबह चार बजे लाइन-अप होकर दोपहर के दो बजे तक एक उंगली पर सेल्फ लोडिंग राइफल (एसएलआर) संभाले परेड करती थीं जो फिर शाम चार बजे से शुरू होकर सात बजे तक चलता था. और या तो उनमें से कइयों का प्रदर्शन उतना ही लचर होता था जितना हममें से कइयों का या फिर उतना ही बेमिसाल होता था जितना हममें से कुछ का. 

मेरा चयन जिस वर्ष 2003 में गणतंत्र दिवस परेड के लिए हुआ था उसकी तैयारी पूरे आठ-नौ महीने चला करती थी और तब जो जिसे हमारे परेड का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी मिली थी वह एक लड़की ही थी. बिहार और झारखंड डायरेक्टरेट के लिए यह पहला मौक़ा था जब उसके एनसीसी दल की अगुआई एक लड़की को मिली थी. 

भारतीय सेना में भी महिलाओं ने अपनी क्षमताओं का लोहा कई बार मनवाया है, प्रशिक्षण के दौरान भी और प्रशिक्षण के बाद भी. बावजूद इसके सेना की तीनों इकाइयों में उनको लेकर होने वाले भेदभाव थमने के संकेत नहीं दिख रहे, उल्टा यह भेदभाव और मुखर होता जा रहा है.

वजह क्या है? अति विशिष्ट सेवा मेडल और विशिष्ट सेवा मेडल से सुशोभित मेजर जेनरल मृणाल सुमन जैसे पितृसत्तात्मक सेनाधिकारियों की भरमार. कुछ महीने पहले लिखे अपने एक आलेख में सुमन कहते हैं, "सेना कोई रोज़गार योजना नहीं है जिसके लिए समाज के हर वर्ग में नौकरी का समान अनुपात में वितरण करना ज़रूरी हो. चूंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है इसलिए चाहे महिला हो या पुरुष, जब तक उनमें युद्ध की क्षमता न हो तब तक उन्हें सेना से जुड़ी युद्ध-भूमिकाओं में शामिल नहीं किया जा सकता."

अव्वल तो इस क्षमता का निर्णय सेना में भर्ती के वक्त कर लिया जाता है और उसके बाद कड़े प्रशिक्षण के ज़रिए उस क्षमता को निखारा जाता है. तो क्या मृणाल यह कह रहे हैं कि प्रशिक्षण के बाद यह भान होता है कि स्त्रियाँ युद्ध-भूमिकाओं के लिए अक्षम साबित होती हैं? उनकी बातें खुद ही विरोधाभासी हैं चूंकि सेना की तीनों ही इकाइयों में यह पहले से ही तय कर लिया गया है कि स्त्रियों को युद्ध भूमिका में शामिल किया ही नहीं जाएगा.

भारत की महिला सैनिकों ने एक से अधिक बार माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की है. शियाचीन ग्लेशियर की सबसे ऊंची चोटी पर बीस से अधिक महिला सैन्य अधिकारियों के एक दल ने 15 अगस्त 2009 को चढ़ाई करने में कामयाबी हासिल की थी. अब अगर इसे विषम परिस्थितयों में प्रदर्शन करना नहीं कहते तो फिर जानें किसे कहते होंगे! 

वर्ष 2010 में ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी के सेना-प्रशिक्षुओं को दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित सम्मान 'स्वोर्ड ऑफ़ ओनर' दिव्या अजित को हासिल हुआ था और इसके लिए उसने अपने 244 समकक्ष पुरुष और स्त्री बेस्ट कैडेट्स को पीछे छोड़ा था.

काबुल के भारतीय दूतावास पर फ़रवरी 2010 में हुए आतंकी हमलों में कम से कम 19 ज़िंदगियाँ बचाने के लिए महिला सैन्य अधिकारी लेफ़्टिनेंट कर्नल मिताली मधुमिता सेना मेडल से सुशोभित किया गया था.

आप कह सकते हैं कि ये उदाहरण मुट्ठी भर हैं, लेकिन फिर आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय सेना में महिलाओं की मौजूदगी पांच प्रतिशत से भी कम है.

वजह साफ़ है, महिलाओं की भर्ती सिर्फ और सिर्फ मेडिकल, लीगल, शैक्षणिक, इंजीनियरिंग, आर्डिनेंस, इंटेलिजेंस, सिग्नल्स और एयर ट्रैफिक कंट्रोल से जुड़े विभागों में भी महज़ अधिकारियों के तौर पर होती है जिसके लिए कम से कम अहर्ता स्नातक है. 

सेना में सिपाहियों के रैंक पर महिलाओं की भर्ती न होना पुरुष और स्त्री के बीच की खाई को और गहरा ही करता है. 1992 में महिला सैन्य अधिकारियों की पहली भर्ती हुई थी और उस बैच की गोल्ड मेडलिस्ट अंजना भादुरिया एक इंटरव्यू में इस सवाल पर कि महिलाओं को भारतीय सेना की युद्ध से जुड़ी भूमिकाओं में अब तक क्यों शामिल नहीं किया गया है, वे कहती हैं, "अगर महिलाएं युद्ध में आएंगी तो चूंकि वे अफसर के पद पर ही भर्ती होती हैं, ज़ाहिर है उन्हें अगुआई करनी होगी और मुझे नहीं लगता मर्दों से भरी जवानों की टुकड़ी एक महिला के नेतृत्व को गरिमा के साथ और सहजता से स्वीकार करने के लिए तैयार हो पाई है. ये तभी संभव है जब सैनिकों की उन टुकड़ियों में महिलाएँ भी शुमार हों."

जब तक साथ काम करने का मौक़ा नहीं मिलेगा तब तक स्वीकार्यता संभव नहीं है. मौजूदगी एक बहुत बड़ी ज़रुरत है बशर्ते सरकार और सेना का इरादा नेक हो. पूर्वग्रह के बजाय महिलाओं को एक ईमानदार मौक़ा देने की चाहत हो. 

लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं. हमारे रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर द्वारा महिला सशक्तिकरण पर बनाई गयी संसदीय समिति को दिया गया तर्क इस दुर्भाग्य की पुष्टि भी करता है, "अगर कोई महिला सैनिक दुश्मन की गिरफ़्त में आती है तो पूरी सैन्य टुकड़ी का मनोबल गिर जाएगा." 

एक माह पूर्व इंडियन एक्सप्रेस के आलेख में एक पूर्व सैन्य अधिकारी सुशांत सिंह लिखते हैं कि रक्षा मंत्री के इस तर्क में पितृसत्ता की बू मिलती है. किसी महिला सैनिक का दुश्मनों के चंगुल में आ जाना उस क्रूर यातना, प्रताड़ना और हत्या से बुरा कैसे हो सकता है जो करगिल के दौरान कैप्टन सौरभ कालिया और उनके सैन्य-दल के साथ हुआ था?

02/10/2015

रोज़ मर रही लाखों लावारिस गायों के लिए प्रतिशोध की भावना आपके मन में क्यों नहीं पनपती?

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में, 2012 के सरकारी आंकड़ों के हिसाब से भी देखें तो बारह हज़ार से अधिक मवेशी - जिनमें बछड़े और बैल समेत 'पवित्र' गाएं जिन्हें हम 'माता' का दर्जा देते हैं  - सड़कों, गलियों और मोहल्लों में कूड़े के ढेर में अपने लिए खाना तलाशते मिल जाएंगे. जबकि यहीं से 45 किलोमीटर दूर दादरी, उत्तर प्रदेश में हिन्दू अतिवादियों का एक समूह 58 वर्षीय मोहम्मद अख़लाक़ को पीट-पीटकर जान से मार डालता है, इसलिए कि उनके घर में कथित तौर पर गौमांस रखा और खाया जा रहा था.

ये वही उत्तर प्रदेश है जहां सबसे अधिक बारह लाख से ज़्यादा मवेशी सड़कों पर बिना किसी सुरक्षा के दयनीय हालत में जीते हैं. ये मवेशी सड़कों के किनारे भोजन की तलाश में कूड़े की ख़ाक छानते हैं और कभी प्लास्टिक तो कभी मेडिकल वेस्ट खाकर मरते हैं या हाइवे पर दुर्घटना का शिकार होकर जान गंवाते हैं. इन्हें लेकर गौ-माता के इन सपूतों में संवेदनशीलता क्यों नहीं है? क्या इन्हें केवल तभी फ़र्क पड़ता है जब मुस्लिम समुदाय पर गौमांस खाने का आरोप लगता है? 

बल्कि अगर अख़लाक़ के घर में गौमांस होता भी, और वो वाक़ई गौमांस खा भी रहे होते तब भी उत्तर प्रदेश के गौ-ह्त्या संबंधी क़ानून के मुताबिक़ वो किसी भी कोण से गुनाहगार नहीं होते. इस क़ानून में साफ़ ज़िक्र है कि अगर सील बंद डब्बे में गौ-मांस खाने के लिए ही सही बाहर से आयात किया गया हो तो आपको दोषी नहीं माना जाएगा.
सज़ा का प्रावधान केवल तब है अगर आप गौ-ह्त्या के दोषी पाए गए हैं और वह सज़ा भी दो साल का कारावास या हज़ार रुपये का जुर्माना  या दोनों है. 

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि पुलिस ने अखलाक की फ्रिज में रखे गोश्त के टुकड़े को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा है ताकि तस्दीक हो सके कि वह गौमांस था या नहीं. मान लेते हैं वे गौमांस ही खा रहे थे, पर ये साबित हो जाना यूपी पुलिस को इस जांच में किसी तरह की भी मदद कैसे करेगा?  

किसी भी लिहाज से ये बहस 'बीफ़ था या मटन' पर केन्द्रित नहीं होना चाहिए, लेकिन अब जब अख़लाक़ की ह्त्या की जा चुकी है तब भी भाजपा के नेता इस ह्त्या को समुचित ठहराने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. भाजपा की पश्चिम यूपी यूनिट के उपाध्यक्ष श्रीचंद शर्मा ने अपने एक बयान में कहा है, "जब हम लोगों की भावनाएं आहात करते हैं तब ऐसी घटनाएं हो ही जाती हैं. ये कोई सामुदायिक दंगा नहीं था. हिन्दू समुदाय गाय को पूजता है और गौ-ह्त्या पर किस हिन्दू का खून नहीं खौलेगा?"
दादरी से भाजपा के विधायक नवाब सिंह नागर ने भी कमोबेश यही बात कही है.

काश ये भावनाएं इस बात पर भी आहात होती कि देश भर में, चाहे ग्रामीण इलाका हो या शहरी, 2012 में पशुपालन विभाग द्वारा करवाए गए आख़िरी सर्वेक्षण के मुताबिक़ 53 लाख से ज़्यादा मवेशी लावारिस सड़कों पर पड़े हैं. 

जहां अलग-अलग राज्य सरकारों ने गौ-ह्त्या के विरुद्ध अलग-अलग प्रावधान बना रखे हैं वहीं सड़क दुर्घटना, ज़हरीला पदार्थ खाने आदि से इनकी सुरक्षा के लिए न कोई क़ानून है, न किसी अतिवादी समूह को गायों के इस तरह मरने से कोई फ़र्क पड़ता है. 

देश के कुछ राज्यों में, गिने चुने एनजीओ के अलावा इन गायों के लिए चिंता जताते हुए न कभी किसी मंदिर को देखा गया है, न समय-समय गौ-ह्त्या के नाम पर बवाल करने वाले तथाकथित हिन्दू संगठनों को. 

भाजपा शासित राज्यों में, जो गौ-संरक्षण के सबसे बड़े झंडाबरदार हैं, बेसहारा मवेशियों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. यहाँ सिर्फ उन राज्यों के आंकड़े हैं जहां भाजपा की दखल राज्य सरकार में कम से कम दस सालों के लिए रही हो. और ये आंकड़े भी 2012 के हैं. तीन साल में हालात सुधरे होंगे, इसकी कोई गुंजाइश नहीं है. क्योंकि किसी भी सरकार ने इनके लिए कोई पहल कभी की ही नहीं.

मध्य प्रदेश - 4,37,910
गुजरात - 2,92,462
बिहार - 2,62,349
छतीसगढ़ - 1,38122
पंजाब - 1,00,991
आंध्र प्रदेश - 42,518

अब यह तय करने का काम जनता जनार्दन का है कि उनके लिए बड़ा मुद्दा क्या है? गौ-ह्त्या के नाम पर किसी का क़त्ल कर देना या जो गायें रोज़ सड़कों पर सूअरों की तरह कूड़े में अपना भोजन ढूंढ रही हैं उन्हें नया जीवन देना. आज गांधी जयंती है. गांधी भी गौ-ह्त्या के खिलाफ़ थे, लेकिन अगर आज वे होते तो उनकी चिंता का विषय क्या होता, लगे हाथ, यह भी सोचिएगा.